शिमला – शिमला जिला की जेसीसी बैठक कर्मचारियों की आपसी सियासत में फंस गई है। सूत्रों के अनुसार कर्मचारियों के एक धड़े ने मामले को मुख्यमंत्री के ध्यान में भी लाया है बावजूद इसके जिला में जेसीसी की बैठक तय नहीं हो पा रही है। महासंघ में भले ही दो गुटों को एक करने की लंबी कवायद हो चुकी है, परंतु अब तक ये एक साथ नहीं हो पाए हैं। बताया जाता है कि शिमला जिला में महासंघ के जिस दूसरे धड़े ने अपना दावा ठोंक रखा है उसके प्रधान सेवानिवृत्त हो चुके हैं। वहीं महासचिव ने अपना त्यागपत्र महासंघ के अध्यक्ष को सौंपा है। ऐसे में उनकी दावेदारी खत्म हो चुकी है फिर भी जिलाधीश शिमला ने जेसीसी की बैठक नहीं बुलाई है। ऐसे में महासंघ के दोनों गुटों की लड़ाई यहां के कर्मचारियों पर भारी पड़ रही है, जिनके साथ सरकार की साढ़े चार साल में एक भी बैठक नहीं हो पाई है। हैरानी की बात यह है कि नगर निगम शिमला के चुनाव सामने हैं और ऐसे में कर्मचारी यहां पर चुनाव डिसाइड करते हैं। ये कहंे कि शिमला में कर्मचारी वर्ग ही नगर निगम का डिसाइडिंग फैक्टर है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस संबंध में महासंघ के कुछ नेताआंे ने सरकार के ध्यान में बात लाई है, जिसका भी कोई फर्क अभी तक नहीं पड़ा है। इन हालातों में सरकार को नगर निगम चुनाव में नुकसान झेलना पड़ सकता है। कांग्रेस नेताओं से भी इस सिलसिले में बात की गई है क्योंकि उनको यहां पर चुनाव लड़ना है और आने वाले दिनों में कर्मचारी वर्ग उनसे इस मुद्दे पर जवाब तलब करेंगे। जानने योग्य ये भी है कि शिमला में कुछ पूर्व कर्मचारी नेता चुनाव मैदान में उतरने की हसरत रखते हैं और वह सिर्फ कर्मचारियों की नब्ज को पकड़ेंगे और कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों पर भी बात करेंगे। हन हालातों में सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है क्योंकि कांग्रेस प्रदेश में सत्तारूढ़ है और उसके नेतृत्व वाली सरकार जिला में जेसीसी नहीं करवा पाई है। जेसीसी की बैठक में यहां के समस्त कर्मचारियों के मसले जुड़े रहते हैं जिन पर कोई बात अभी तक नहीं हो सकी है। यही नहीं प्रदेश के दूसरे जिलों में जेसीसी की बैठक हो चुकी हैं। कुल मिलाकर सरकार महासंघ के ही दोनों धड़ों के बीच चल रही आपसी राजनीति में जेसीसी की बैठक नहीं करवा पाई। देखना होगा कि नगर निगम चुनाव में इसका कितना असर पड़ेगा।
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