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Sunday, December 8, 2019

बिल्व वृक्ष के फायदे

बिल्व [बेल ] का वृक्ष बड़ा होता है । उसकी पत्ती तीन दल की होती उसी को बेलपत्र कहते हैं।

धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। हिन्दू धर्म में इसे भगवान शिव का रूप ही माना जाता है व मान्यता है कि इसके मूल यानि जड़ में महादेव का वास है तथा इनके तीन पत्तों को जो एक साथ होते हैं उन्हे त्रिदेव का स्वरूप मानते हैं परंतु पाँच पत्तों के समूह वाले को अधिक शुभ माना जाता है, अतः पूज्य होता है। धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। इसके वृक्ष १५-३० फीट ऊँचे कँटीले एवं मौसम में फलों से लदे रहते हैं। इसके पत्ते संयुक्त विपत्रक व गंध युक्त होते हैं तथा स्वाद में तीखे होते हैं। गर्मियों में पत्ते गिर जाते हैं तथा मई में नए पुष्प आ जाते हैं। फल मार्च से मई के बीच आ जाते हैं। बेल के फूल हरी आभा लिए सफेद रंग के होते हैं व इनकी सुगंध भीनी व मनभावनी होती है।

शिवजी की मूर्ति पर विल्व पत्र चढ़ाई जाती है। श्रावण मास में शैब शिवजी की पूजा करते समय वही बेलपत्र चढाते हैं, बेल वृक्ष काँटेदार होता है।

बेल का फल ५-१७ सेंटीमीटर व्यास के होते हैं। इनका हल्के हरे रंग का खोल कड़ा व चिकना होता है। पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है जिसे तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है। इस गूदे में छोटे, बड़े कई बीज होते हैं। बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए। दोनों के गुण समान हैं। जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं। बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है। इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह १०-१५ खण्डों में विभक्त सा लगता है, जिनमें प्रत्येक में ६-१० बीज होते हैं। ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं। प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है। कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है। इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है।

आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है। फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है। आयुर्वेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी अत्यधिक लाभदायक है। चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं। बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है। यह आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है।

बेल फल का गूदा डिटर्जेंट का काम करता है जो कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। यह चूने के प्लास्टर के साथ मिलाया जाता है जो कि जलअवरोधक का काम करता है और मकान की दीवारो सीमेंट में जोड़ा जाता है। चित्रकार अपने जलरंग मे बेल को मिलाते है जो कि चित्रों पर एक सुरक्षात्मक परत लगाता है।

इसका बिल्व वृक्ष फल पका हुआ मीठा होता है, बेल की गूदी ही प्रायः काम में श्राती हैं । 'बेल की गूदी दस्तों को रोक देती है। बेल का मुरब्बा अथवा बेल का सिकञ्जवौन खाने से दस्त बन्द हो जाते हैं और दाह गर्मी शान्त हो जाती है। जो तेल खटाई गुड हींग और भंटा नहीं खाय, परहेज से रहे तो पके हुए बेलकी गिरी आधा छंटॉक, सात काली मिर्च पैसा भर मिश्री, सफेद इलायची के दाने माशे भर घोट कर पौने से खूनी बवासीर शांत हो जाती है। बेल की पत्ती पीसकर पानी में चीनी मिला कर शर्बत पीने से रतौँधी अच्छी होती है । बहरेपन में बेल का गूदी बकरी का दूध और गौमूत्र में तेल पकाकर छानकर डालने ने यह रोग दूर होता है ।

हरा बेल उबालकर कुल्ला करने से "मु'हकाआना" दूर हो जाता है। बेलपत्र का रस शरीर की दुर्गन्धि को दूर करता है ।
बेल का गूदा आमं की कोसला, जायफल और अफीम के साथ पानी में पीस, पेट पर लेप करने से पतला दस्त बन्द होता है ।
बेल के पेड़ की छाल का काढ़ा दिल की धड़कन को बन्द करता है । बेल की गूदी और धनिया का काढा गभिणी स्त्री की कय को दूर करता है ।

बेल के फल की मज्जा में मूलतः ग्राही पदार्थ पाए जाते हैं। ये हैं-म्युसिलेज पेक्टिन, शर्करा, टैनिन्स। इसमें मूत्र रेचक संघटक हैं-मार्मेलोसिन नामक एक रसायन जो स्वल्प मात्रा में ही विरेचक है।इसके अतिरिक्त बीजों में पाया जाने वाला एक हल्के पीले रंग की तीखा तेल (लगभग १२ प्रतिशत) भी रेचक होता है। शक्कर ४.३ प्रतिशत, उड़नशील तेल तथा तिक्त सत्व के अतिरिक्त २ प्रतिशत भस्म भी होती है। भस्म में कई प्रकार के आवश्यक लवण होते हैं। बिल्व पत्र में एक हरा-पीला तेल, इगेलिन, इगेलिनिन नामक एल्केलाइड भी पाए गए हैं। कई विशिष्ट एल्केलाइड यौगिक व खनिज लवण त्वक् में होते हैं।

Thursday, December 5, 2019

गाजर

गाजर को खाद्य वस्तुओं की रानी माना जाता है । गाजर के रस
को जीवन-रस कहा जा रहा है । गाजर में कैरोटीन [ विटामिन 'ए'
का पीला अंश] अधिक पाया जाता है । शाक-सब्जियों में गाजर का
स्थान पौष्टिकता की दृष्टि से बहुत ऊँचा है ।
भारत के सभी प्रान्तों में गाजर की खेती होती है-पहाड़ो
इलाकों में भी और मैदानी क्षेत्रों में भी । देहाती लोग अन्न न मिलने
या कम होने पर गाजर से हो नाश्ता करते और गाजर से ही पेट
भर लेते हैं । मनुष्य-शरीर को पुष्ट करनेवाले सारे तत्त्व इसमें मौजूद
रक्त खून] की कमी को दूर करने के लिए यह परम औषध है ।
इसमें लोहे की मात्रा बहुत प्रधिक है और यह तुरन्त पचकर रक्त में
जा मिलती है ।

इंग्लेंड में राज्य की ओर से देशवासियों को आदेश है कि वे गाजर का अधिक-से-अघिक प्रयोग करें । अंडे तथा मांस से प्रधिक
ताकत देनेवाला अंश गाजर में विद्यमान है । इंग्लैंड के रेलवे- स्टेशनों
के सटालों पर तथा लंदन के रेस्तरा में गाजर ने दूध का तथा दुग्ध
मे निमित पदार्थों का स्थान ले लिया है ।
मधुमेह [डायबिटीज] दमा चिड़चिड़ापन, बेरीबेरी, स्नायु-
दुर्बलता [पुट्ठों की कमजोरी), कब्ज, पेट में केंचुओ का पड़ना,
जबड़ों-होंठों-मुंह मे छाले पड़ना, स्त्रियों के स्तनों में दूध की कमी
होना, विटामिन 'सी' की कमी से होनेवाले रोगों आदि में गाजर
बहुत ही लाभदायक है ।
विटामिन 'ए' भी गाजर में पर्याप्त है; अत: कच्ची, उबालकर,
भूनकर, सब्जी बनाकर, मुरब्बा बनाकर या रस निकालकर- जैसे
भी हो गाजर का प्रयोग कीजिए । आँखों के लिए गाजर बढ़िया
'टॉनिक' है । विटामिन 'ए' की कमी से ही नेत्र रोग होते हैं और
दृष्टि-शक्ति कमजोर होती है । गाजर के प्रयोग से वह कमी दूर हो
जाती है । दूसरे विश्वयुद्धं में वायुयान-चालकों को गाजर रस पीने
के लिए विवश किया जाता था, ताकि अधिक ऊँचाई पर, रात्रि में
तथा धुन्ध और बादलों में भी उनकी दृष्टि ठीक-ठीक काम करती
रहे । जैसे झाड़ू कमरे को साफ़ करती है, वैसे ही गाजर कोष्ठ
[अन्तड़ियों तथा मलाशय] को साफ़़ करती है ।
देसी या कंपोस्ट खादवाले खेत में उपजी गाजर अधिक गुण-
कारी होती है । रासायनिक खादोंवाले खेत में उपजी गाजर सुंदर
होने पर भी कम उपयोगी होती है ।

अंगूर

अंगूर बलकार फल है । भूख को बढ़ाता है । हृदय को ताकत देता है । नया रक्त उत्पन्न करता है । कब्ज दूर करता है । यह आंखों की ज्योति और चेहरे की कांति को बढ़ाता है । एक छोटा गिलास अंगूर का रस पीने से सारे शरीर में तुरंत ही नए रक्त का संचार होता है ।

 वैज्ञानिक विश्लेषण

Total Fat 0.4 g 0%
Saturated fat 0.1 g 0%
Polyunsaturated fat 0.1 g
Monounsaturated fat 0 g
Cholesterol 0 mg 0%
Sodium 2 mg 0%
Potassium 191 mg 5%
Total Carbohydrate 17 g 5%
Dietary fiber 0.9 g 3%
Sugar 16 g
Protein 0.6 g 1%
Vitamin A 2% Vitamin C 6%
Calcium 1% Iron 1%
Vitamin D 0% Vitamin B-6 5%
Cobalamin 0% Magnesium 1%
*Per cent Daily Values are based on a 2,000 calorie diet.

जितनी ग्लूकोज शर्करा अंगूर में मिलती है किसी अन्य फल में नहीं मिलती । यह शर्करा सिर्फ शरीर को स्फूर्ति शक्ति तथा ऊर्जा देकर कार्य की शक्ति और सहन शक्ति बढ़ाती है ।

रोगों का इलाज

अन्तडि़यो का क्षय -अन्तडि़यो का क्षय दूर करने के लिए अंगूर से कायाकल्प समान प्रभाव होता है । इसकी विधि इस प्रकार है

पहला दिन प्रातः सौ ग्राम अंगूर खाएं इसके हर 2 घंटे बाद 100 ग्राम अंगूर खाएं इस तरह 5 बार में 500 ग्राम अंगूर खाएं
दूसरा दिन डेढ़ सौ ग्राम अंगूर खाएं इसके हर घंटे में हर 2 घंटे बाद डेढ़ सौ ग्राम अंगूर खाएं
तीसरा दिन प्रातः 200 ग्राम अंगूर खाएं और हर 2 घंटे बाद 200 ग्राम अंगूर खाएं
चौथा दिन प्रातः ढाई सौ ग्राम अंगूर खाए उसके हर 2 घंटे बाद ढाई सौ ग्राम खाएं
पांचवा छठा और सातवां दिन प्रातः 300 ग्राम अंगूर खाएं इसके हर 2 घंटे बाद 300 ग्राम अंगूर खाएं
आठवां दिन हर 2 घंटे बाद ढाई सौ ग्राम
नौवां दिन हर 2 घंटे बाद 200 ग्राम
दसवां दिन हर 2 घंटे बाद डेढ़ सौ ग्राम
11 दिन हर 2 घंटे बाद 100 ग्राम अंगूर खाएं इसके साथ ही अन्तडि़यो का क्षय लुप्त हो जाएगा I

अर्जुन


इसके पेड़ दिल्ली और अन्य शहरों की सड़कों पर बहुत लगे हुए हैं । इसके तने का रंग ऊपर से सफेद और अंदर से लाल होता है । इसकी छाल जितनी सफेद होती है उतनी ही ज्यादा लाभदायक होती है । इसके पत्ते अमरूद के पत्ते जैसे चार 5 इंच लंबे और 2 इंच तक चौड़े होते हैं । फूल पीला और फल दो तीन अंगुल लंबा हरा कमरख के फल की तरह फांकदार परंतु लकड़ी जैसा कड़ा  रुयेंदार होता है । इसकी पांच या छे रुख उभरे हुए होते हैं । इस पेड़ की छाल भी दवाइयों के काम आती है । इसकी छाल का काढ़ा प्रदर, प्रमेह, दस्त और पेचिश में लाभदायक है और घाव को धोने से जल्द अच्छा करता है । इसकी 30 ग्राम छाल में दूध पाव सेर और पानी आधा किलो मिलाकर पकाओ । जब सब भारी जल जाए और उसको छान कर थोड़ी मिश्री मिलाकर पीने से दिल को ताकत मिलती है और टूटी हुई हड्डी तक जुड़ जाती है । इसके फल हरड़ की तरह दस्तावर होते हैं और इसके पत्तों का रस कान के दर्द को दूर करने में लाभदायक है ।

Sunday, March 24, 2019

रसोन [ लहसुन ]

रसोन [ लहसुन ] खाने से दाँत , मांस , नाखन , केश , रंग , रूप तथा अवस्था कभी दुर्बल नहीं होते । जो स्त्रियाँ नित्य इसका सेवन करती हैं , उनके उरोज [ स्तन ] कभी शिथिल नहीं होते , नीचे को नहीं लटकते ; बल्कि कठोर ही बने रहते हैं । जिनके उरोज लटकने लगे हों , वे यदि इसका सेवन शुरू कर दें तो स्तन फिर से तन जाएँगे । जो स्त्रियाँ रसोन का निरन्तर सेवन करती हैं , उन्हें संभोग से होनेवाली कोई बीमारी नहीं होती । पुरुष इसके सेवन से बलवान् , दृढ़ , बुद्धिमान् , सुन्दर कान्तिवाले , सन्तानवाले तथा दोर्घ आयुवाले होते हैं । संस्कृत ग्रन्थोंमें  इसे ' अमृतोद्भव , [ अमृत से उत्पन्न ] कहा गया है । इसके प्रयोग से पुरुष देर तक वीर्य की रोके रह सकता है ।
निरन्तर रसोन का सेवन करने वाला पुरुष जब मैथुन करता है , तो स्त्री को तुरन्त गर्भ हो जाता है और गर्भ पूर्ण समय तवा ठहरता तथा ठीक समय पर नीलकमल की सुगंधिवाला तथा लाल कमल जैसे रंगवाला बच्चा पैदा होता है ।
लहसुन चिकना , गर्म , तीखा , कटु , भारी , मल लानेवाला , विपाक में मधुर , बल - वीर्य - बुद्धि - स्मृति देनेवाला , चेहरे के रंग को निखारने वाला तथा कंठ के स्वर को मधुर करनेवाला है ।
पुराना बुखार , हृदय का रोग , कुक्षि का शुल , कब्ज़ , अफारा , अनपच , पेट के कीड़े , बाई तथा कफ़ इससे नष्ट होते हैं । खाँसी , दमे तथा कुष्ट के रोगी को देना पथ्य है , हितकर है ।
हडी टूटी हो , तिडक गई हो , अपने स्थान से हट गई हो , बढ़ गई हो , अर्थात् हड्डी का कोई भी कष्ट हो , रसोन उसके लिए अमृत है । आँखों का कोई भी कष्ट हो , रसोन के सेवन से उसे दूर करने में मदद मिलती है ।
तिल्ली या जिगर बढ़े हुए हों , जिगर [ Liver ] या मसाने [ मूत्राशय ] में सूजन या पत्थरी हो , तो रसोन के सेवन से आराम होता है । लहसुन अत्यन्त सबल और कीटाणुनाशक [ Antiseptic = प्रति रोधी ] है । किसी प्रकार का भी पीपभरा फोड़ा या व्रण जख्म ] आदि हो , इसका प्रयोग बढ़ा देने से आराम जल्दी होता है ।
लहसुन खानेवाले पर पोलियो का अाक्रमण नहीं होता । यदि पोलियो हो गया हो , तो प्रात : निराहार लहसुन की चार फर्क तुरियाँ छीलकर कच्ची ही चबावे । पोलियो दूर हो जाएगा । उसके बाद लहसुन का प्रयोग निरन्तर जारी रखेंगे तो पोलियो कभी नहीं होगा ।

विश्लेषण -

Serving Size 100 g
Amount Per Serving
Calories 149

Total Fat 0.5g 1 %
Saturated Fat 0.1g 0 %
Sodium 17mg 1 %
Total Carbohydrate 33g 12 %
Dietary Fiber 2.1g 8 %
Sugar 1g
Protein 6.4g 13 %
Vitamin A 0 %
Vitamin  C 35 %
Calcium 14 %
Iron 9 %
Daily values are based on 2000 calorie diet.


लहसुन की दुर्गन्ध तीव्र होती है ; अतः बहुत - से लोग इसे नहीं खाते ।
परन्तु
एको हि दोषो गुणसन्निपाते । ।
निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवांकः । ।

गुणों के समूह में एक दोष उसी प्रकार छिप जाता है , जैसे चन्द्रमा की किरणों में कलंक किाला धब्बा ] । इसकी तीव्र गन्ध ही है , जो प्रबल - से - प्रबल कीटाणुगों , कृमियों तथा असाध्य रोगों को मिटाती है ।

बाजीकरण , नपुंसकताहरण दवा 

२०० ग्राम लहसुन को सिल पर बारीक पीसकर , ६०० ग्राम शुद्ध शहद में मिलाकर शीशी में डालकर , शीशी का मुंह बन्द कर दीजिए । फिर इसे गेहूं के ढेर या बोरी में दबा दीजिए । २१ या ३१ दिन बाद इसे निकालकर , सवेरे - शाम १० ग्राम की मात्रा खाकर ऊपर से धारोष्ण या कवोष्ण [ गुनगुना ] दूध पियें । २१ या ३१ दिन में आश्चर्यजनक लाभ होगा ।

फेफड़ों के क्षय का इलाज

लहसुन का रस रुई पर छिड़ककर उस रुई को नासों पर बाँध है । लहसुन की गंध तथा गुणों को लेकर जो साँस फुफ्फुसों में जाएगा , वह क्षय को दूर करेगी ।

गला बैठना , घंडी [ घंटी ] गिरना , स्वर में खरखराहट का उपाय जल गर्म करके उस में लहसुन का रस घोल लीजिए । प्रातः मिनट प्रतिदिन गरारे कीजिए ।