राजगढ़ — यह उस जमाने की बात है, जब हमारे प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के लिए कपड़े लंदन से सिल कर आते थे। उसी दौरान हिमाचल प्रदेश में भी एक नेता हुआ करते थे, जिनका नाम था वैद्य सूरत सिंह, जो कि प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम पझौता आंदोलन के मुखिया थे। एक बार वह अपने गांव के निकट वाले बाजार में बस में बैठकर जा रहे थे तो रास्ते में उनका कोई मित्र भी उसी बस में सवार हुआ। वैद्य जी के कपड़ों को देखकर उन्होंने हैरान होकर वैद्य जी से पूछा, कल ही तो मेरे सामने आपने नया कुर्ता-पायजामा सिलवाया था और आज इसमें पैबंद (टल्लू) लगे हुए हैं, क्या रात को ये कहीं फट गए थे? वैद्य जी ने मुस्करा कर कहा, ‘नहीं भाई, यह नए ही हैं और न ही फटे हुए हैं। मित्र ने फिर पूछा, तो ये पैबंद…? तब वैद्य जी ने कहा, दरअसल मेरे पास कपड़े नहीं थे, इसलिए मजबूरी में सिलवाने पड़े, मगर मुझे ध्यान आया कि यदि मैं नए कपड़े पहनूंगा तो लोग भी नए कपड़े सिलवाने की सोचेंगे और हम ग्रामीणों के पास इतने पैसे होते कहां हैं। इसलिए रात को मैंने नए सिलवाए कुर्ता-पायजामा में अपने हाथों से पैबंद लगा दिए, ताकि लोग मुझे उन्हीं पैबंद लगे कपड़ों में देखें। यहां याद दिला दें कि वैद्य सूरत सिंह अपने चुनाव क्षेत्र में हमेशा पैबंद लगे कपड़े पहन कर ही मंच से संबोधित करते थे। वह इतने सादे थे कि जब वह एमएलएम तथा खादी बोर्ड के चेयरमैन रहे तो अपने आवास के फर्नीचर को लेने से इनकार कर दिया था। सारा काम फर्श पर ही करते थे और सोते भी फर्श पर ही थे।
from Divya Himachal
No comments:
Post a Comment