नादौन — 13 अप्रैल को महानायक जनरल जोरावर सिंह की जयंती है। जनरल जोरावर सिंह एक महान योद्धा, कुशल प्रशासक, वीर व साहसी ही नहीं, बल्कि धर्म परायण व स्वामी भक्त थे। उन्होंने सीमा विस्तार मैदानी क्षेत्रों की तरफ करने के बजाय दुर्गम भू-भाग की ओर अपना अभियान शुरू किया। इस महान योद्धा की वीरता के परिणामस्वरूप लद्दाख को हिस्सा बनाया और यह राज्य आज भारत का भू-भाग है। जोरावर सिंह का जन्म 13 अप्रैल, 1794 ई. को चंद्रवशी राजपूत हरजे सिंह ठाकुर के घर गांव अन्सरा मौजा हथोल नादौन जिला हमीरपुर में हुआ। उनके पिता कहलूर बिलासपुर रियासत के दरबारी थे। गांव में भूमि विवाद को लेकर झगड़े के कारण, जोरावर घर छोड़कर हरिद्वार चले गए। लाहौर के शासक रणजीत सिंह व कांगड़ा के राजा संसार चंद की सेनाओं में सेवा करने के बाद जम्मू चले गए। वहां पर इनकी भेंट महाराजा गुलाब सिंह से हुई। गुलाब सिंह ने उन्हें अपनी सेवा में लिया व उनसे प्रभावित होकर 1821 ई. में रियासी क्षेत्र का प्रबंधन उन्हें सौंपा। 1822 ई. में उन्हें किश्तवाड़ का गवर्नर नियुक्त किया। यहां पर उन्होंने सेना को प्रशिक्षित किया व 1834 ई. में चार हजार सैनिकों के साथ किश्तवाड़ के रास्ते आगे बढ़ते हुए सुरू व सोड़ के किलों को अपने अधीन किया। 10 दिसंबर, 1841 ई. को जोरावर सिंह तोन्यू के निकट तिब्बतियों की 10 हजार सेना से भिड़ गए, अभी निर्णायक लड़ाई चल रही थी कि 12 दिसंबर, 1841 ई. को रणवीर सपूत को गोली लग गई। जोरावर सिंह की वीरता व योग्यता से प्रभावित होकर तिब्बतियों ने व्यू नामक स्थान पर उनकी समाधि बनाईं। जिस महान सपूत ने आज इतने भू-भाग को भारत का अंग बनाया है, वह आज तक उपेक्षा का शिकार है। जनरल जोरावर सिंह महाविद्यालय धनेटा में इतिहास के सहायक प्रो. राकेश कुमार शर्मा ने बताया कि जनरल जोरावर सिंह महान योद्धा थे। जहां पर जोरावर सिंह के पार्थिव शरीर की समाधि बनाई गई है वह एक पवित्र स्थान माना जाता है। पूरी दुनिया में यहीं एक मात्र स्मारक है जहां विजेताओं ने हारे हुए सैनिक के पार्थिव अवशेषों को सम्मान सहित सहेज कर रखा है।
from Divya Himachal
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