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Monday, April 29, 2013

हिमाचल से गायब होगी लैंटाना घास

शिमला — लैंटाना एक विदेशी हानिकारक खरपतवार है, जिसके कारण वर्तमान में शिवालिक पहाडि़यों की लगभग 185000 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित हो रही है। इस खरपतवार के कारण न केवल वन संपदा को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि भूमि की उपजाऊ शक्ति भी प्रभावित हो रही है, जिससे लोगों की आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। प्रदेश सरकार ने इस गंभीर समस्या पर संज्ञान लेते हुए वन विभाग को निर्देश दिए हैं कि प्रभावित क्षेत्रों से प्राथमिकता के आधार पर खरपतवार को हटाया जाए, ताकि भूमि की उपजाऊ शक्ति को यथावत रखते हुए लोगों की आजीविका के साधनों में वृद्धि की जा सके। प्रदेश के विशेषकर निचले क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि तथा वन क्षेत्रों को लैंटाना के कारण होने वाले नुकसान को देखते हुए वन विभाग ने 5000 हेक्टेयर प्रभावित भूमि पर ऐसे फलदार एवं अन्य पौधों की किस्में लगाने का निर्णय लिया है, जो पर्यावरण मित्र हों। प्रदेश सरकार ने वृहद स्तर पर औषधीय एवं चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष लगाने का निर्णय भी लिया है, ताकि क्षेत्रवासियों को भोजन, चारा एवं ईंधन प्राप्त हो सके। विभाग ने भारतीय प्रतिपूरक वनरोपण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (कैंपा), केंद्र सरकार के ग्रीन इंडिया मिशन तथा आंशिक रूप से मनरेगा के अंतर्गत लगातार फैलती जा रही लैंटाना से ग्रसित भूमि के उपचार का निर्णय लिया है। इस कार्य में सहभागी वन प्रबंधन समितियां, जिनमें स्थानीय लोग शामिल हैं, का सहयोग भी लिया जाएगा। वर्तमान प्रदेश सरकार लोगों को वन एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने पर बल दे रही है। इस वर्ष 2000 हेक्टेयर गैर कृषि भूमि को वनों के अधीन लाने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। प्रदेश के कुल 55673 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में से 37033 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल अर्थात 66.52 प्रतिशत को वनों के अधीन चिन्हित किया गया है। भारतीय वन सर्वेक्षण की वर्ष 2011 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश का 3224 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल सघन वन क्षेत्र, 6381 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल हल्के सघन वन क्षेत्र तथा 5074 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल खुले वनों के अधीन है। शेष क्षेत्र में झाडि़यां तथा बंजर भूमि इत्यादि शामिल हैं। वर्ष 2011-12 तक पौधारोपण के माध्यम से 10385 वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त क्षेत्रफल को वनों के अधीन लाया गया है। प्रदेश की बहुमूल्य वन संपदा के संरक्षण के लिए राज्य सरकार द्वारा राज्य वन नीति-2005 के दिशा-निर्देश अपनाए गए हैं। 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत वन आवरण बढ़ाने, प्रतिपूरक पौधारोपण करने तथा स्थानीय लोगों की सहभागिता से उचित मानकों के आधार पर पौधारोपण करने का निर्णय लिया गया है।






source: DivyaHimachal

Full Story at: http://www.divyahimachal.com/himachal-latest-news/%e0%a4%b9%e0%a4%bf%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%b2-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%ac-%e0%a4%b9%e0%a5%8b%e0%a4%97%e0%a5%80-%e0%a4%b2%e0%a5%88%e0%a4%82%e0%a4%9f%e0%a4%be/


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