शिमला – नगर निगम चुनाव का शोरगुल थम चुका है। पिछले 15 दिनों के दौरान कांग्रेस व भाजपा के नेताओं ने खूब पसीना बहाया। वामदल भी पीछे नहीं रहा। बावजूद इसके सभी नेताओं की धुकधुकी उस वोटर ने बढ़ा दी है, जो मतदान तक चुप्पी साधे बैठा है। हालांकि कांग्रेस व भाजपा दोनों ही बड़े दल वर्चस्व के दावे जता रहे हैं। मगर अंदरूनी तौर पर दोनों ही दल चुनौतियों से घिरे हैं। शिमला कर्मचारियों की एक बड़ी जमात से भरा पड़ा है। मतदान में इस वर्ग का खास रोल रहता है। यही नहीं महिला वर्ग व युवा वर्ग वोटिंग के लिए शिमला में खुलकर बाहर आता है। पहले 25 वार्ड थे, अब इनकी संख्या बढ़कर 34 हो गई हे। यानी प्रचार का दायरा भी बढ़ा है व वोटर भी बढ़े हैं। नगर निगम में कामकाज को लेकर भाजपा-कांग्रेस सरकार व वामदल को जमकर कोसती रही। प्रचार में भी यह सब दिखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शिमला के लिए कई बड़ी योजनाएं लाने के आश्वासन भी भाजपा ने दिए हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने गत साढ़े चार वर्षों के दौरान किए गए कार्यों, शिमला के सौंदर्यकरण व अन्य उपलब्धियों को गिनाकर वोट मांगे हैं। वामदल बड़े दावों के बावजूद अंतिम दौर तक घोषणा पत्र जारी नहीं कर सका है। हालांकि इस दल द्वारा वादे जरूर किए जा रहे हैं। मतदाता की चुप्पी के बीच नगर निगम, जिसे मिनी एसेंबली के चुनाव भी कहा जाता है, कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने हैं, क्योंकि पार्टी की सरकार सत्ता में है। जबकि भाजपा के लिए चुनौती। क्योंकि विपक्ष सत्ता में आने के दावे कर रहा है। मोदी लहर भी बताई जा रही है। शिमला में मतदाता पढ़ा-लिखा है, संपन्न भी है। यहां वार्डों में प्रत्याशी के रसूख, उसकी छवि व कार्य क्षमता को देखकर मत पड़ते रहे हैं। हालांकि ये चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं हो रहे हैं। बावजूद इसके तीनों ही दलों ने दिन-रात एक की है। दिग्गज वार्ड से वार्ड नुक्कड़ सभाएं व व्यक्तिगत संपर्क करने में व्यस्त रहे हैं। वर्करों ने भी खूब पसीना बहाया है। बावजूद इसके भीतरघात की समस्या जस की तस है। जिस भी दल को इसका दंश ज्यादा लगेगा, उसी की पीठ लगेगी। अब इसमें कांग्रेस ऊपर होगी या भाजपा यह चुनाव नतीजे ही बताएंगे।
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^पूरी खबर पढ़े: source - DivyaHimachal
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