कुल्लू— ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क को विश्व धरोहर का रुतबा मिलने से घाटी के लोग कई तरह की नई बंदिशों को लेकर आशंकित हो उठे हैं। सिर पर मंडरा रहे विस्थापन को टालने के लिए शाकटी, शुगाड़ और मरौड़ के बाशिंदे देवताओं की शरण में चले गए हैं। यूनेस्को के कड़े मापदंड ऐसे हैं कि विश्व धरोहर स्थलों के संरक्षण के लिए क्षेत्र में विशेष बढ़ते मानवीय दखल को रोकना जरूरी है। उत्तराखंड की फूलों की घाटी, राजस्थान के नेशनल पार्क भरतपुर के साथ ही उत्तराखंड के नंदा देवी नेशनल पार्क, दुनिया में सबसे बड़े डेल्टा का गौरव रखने वाले पश्चिम बंगाल के सुंदर वन तथा असम के काजिरंगा और मानस वर्ल्ड हेरिटेज साइट में भी मानवीय गतिविधियों को सीमित किया जा चुका है और रिहायशी बस्तियों को अलग किया गया है। इसी तरह पश्चिमी घाट नेचुरल साइट में भी मानवीय हस्तक्षेप को सीमित करने के प्रयास जारी हैं। सूत्र बताते हैं कि जीएचएनपी के अधिकारियों ने यूनेस्को को आश्वस्त किया है कि पार्क के तहत आने वाले तीनों छोटी रिहायशी बस्तियों को जल्द वहां से शिफ्ट कर दिया जाएगा। ऐसे में शाकटी, शुगाड़ तथा मरौड़ के करीब दो दर्जन परिवारों को विस्थापन की आशंका सताने लगी है। शाकटी के रहने वाले तुलसी राम, शमशेर, हीरा लाल, तेज राम, शेर सिंह तथा स्थानीय पंचायत गाड़ा पारली के प्रधान बुध राम कहते हैं कि जीवन में विस्थापन से बड़ी कोई त्रासदी नहीं हो सकती।
from Divya Himachal
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