कुल्लू — प्रदेश के जंगलों से कुछ गिनी-चुनी बेशकीमती जड़ी बूटियां लुप्त होने की कगार पर पहुंच गई हैं। जीवी पंत मौहल के वैज्ञानिकों द्वारा अपर व्यास वैली में करवाए गए शोध में इसका खुलासा हुआ है। वैज्ञानिकों के अनुसार पहले मुकाबले जंगलों से अब अलग-अलग जड़ी बूटियों की प्रजातियां धीरे-धीरे कम हो रही हैं, जो कि काफी चिंता का विषय है। वैज्ञानिकों का मानना है जिस तरह से जंगलों से जड़ी-बूटियां की प्रजातियां कम हो रही हैं, उससे मनुष्य के जीने के साधन भी धीरे-धीरे कम होते जाएंगे। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की विभिन्न घाटियों पर बेशकीमती जड़ी बूटियां पाई जाती हैं, जिनसे प्रदेश करोड़ों रुपए कमाकर उन्हें बाहरी राज्यों में दवाइयों बनाने के लिए भेजता है, लेकिन अब धीरे-धीरे जड़ी-बूटियां लुप्त होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ साल पहले नागछतरी जिस मात्रा में पाई जाती थी, उस मात्रा में अब नागछतरी नहीं मिलती है। आवासीय क्षेत्रों से तो इस जड़ी-बूटी का पूरी तरह से नामोनिशान ही मिट गया है। हालांकि सरकार ने नागछतरी को निकालने के लिए प्रदेश में गिने-चुने लोगों को ही लाइसेंस देकर रखा हुआ है, लेकिन उसके बावजूद दिन-प्रतिदिन इसकी पैदावार कम हो रही है। वहीं लुप्त होती अन्य जड़ी-बूटियों में जटामासी, सकडु, चोरा और हथपंजा प्रमुख हैं। प्रथम चरण के शोध कार्य में इन जड़ी- बूटियों की संख्या काफी घट चुकी है, जिससे प्रदेश के वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ना लाजिमी है। जीवी पंथ मौहल के वैज्ञानिक प्रभारी डा. एसएस सांमत ने जानकारी देते हुए बताया कि अपर व्यास वैली में हाल ही में करवाए गए शोध में उन्होंने पाया कि जंगलों से अलग-अलग प्रजातियों की जड़ी-बूटियां कम हो रही हैं, जो कि एक चिंता का विषय है।
from Divya Himachal
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