शिमला-नगर निगम शिमला के औहदेदारों के चेहरे बदले हैं, क्या चेहरे बदलने से नगर निगम में भी बदलाव होगा, यह बड़ा सवाल है। शिमला को स्मार्ट सिटी में परिवर्तित करने की एक बड़ी चुनौती सामने खड़ी है क्योंकि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत अब तक वो काम नहीं हो सके हैं जो किए जाने चाहिए थे। सभी योजनाएं अधूरी हैं ऐसे में नगर निगम के नए मेयर व डिप्टी मेयर इन्हें किस तरह से कितनी जल्दी सिरे चढ़ाएंगे यह देखना जरूरी होगा। नई मेयर सत्या कौंडल व डिप्टी मेयर शैलेंद्र चौहान दोनों ही वरिष्ठ पार्षद हैं। इनका लंबा अनुभव है और अपने-अपने वार्डों में अपनी छवि भी साफ है। अपने वार्डों से बाहर निकलकर अब इनको पूरे शहर के बारे में सोचना है जिनकी सोच शहर के लिए कितनी प्रभावशाली होगी यह देखना होगा। इनके पास ढाई साल का समयकाल है और अभी सरकार का भी साथ है। सरकार के साथ सामंजस्य बिठाकर शिमला की नई तस्वीर उकरने का मौका सत्या कौंडल व शैलेन्द्र को मिला है। शहर के लोगों को इन दोनों से खासी उम्मीदें हैं जो जानते हैं कि लगातार अपने वार्ड से पार्षद के पद पर जीतने वाले दोनों लोग यूं ही नहीं जीते। ऐसे में पार्टी ने भी उनपर भरोसा जताया है। यह भरोसा शिमला शहर के लोगों का तो है ही वहीं भारतीय जनता पार्टी का भी है। विशेषकर शिमला के विधायक सुरेश भारद्वाज की पसंद यह दोनों नेता रहे हैं, शायद तभी संजीव ठाकुर को झटका लग गया है। सुरेश भारद्वाज क्योंकि यहां से विधायक हैं इसलिए उनकी पसंद को अधिमान दिया गया है वहीं नरेन्द्र बरागटा भी इसमें बराबर शामिल रहे हैं। शहर के पहाड़ी मतदाताओं में नरेन्द्र बरागटा की भी पैठ है और नए मेयर व डिप्टी मेयर दोनों पहाड़ से ही हैं। इसलिए इनके चयन में वह भी बराबर शामिल रहे और गेमचेंजर की भूमिका इन दोनों नेताओं ने निभाई है। शिमला में पहाड़ के मतदाताओं को रिझाने के लिए भी भाजपा का यह एक बड़ा प्रयास माना जा सकता है। संजौली और ढली जिन वार्डों से मेयर व डिप्टी मेयर ताल्लुख रखते हैं उनमें अधिकांश पहाड़ के लोग रहते हैं जोकि नगर निगम में यहां के मतदाता भी हैं। इनके चयन में ये फैक्टर भी रहा है। फिलहाल सवाल यह है कि चेहरे बदलने से क्या नगर निगम में बदलाव होगा क्योंकि पूरा शहर शिमला के विकास के दृष्टिगत इन्हें देखा जा रहा है और यहां अभी बड़े पैमाने पर विकासीय योजनाएं अधर में लटकी हैं।
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