शिमला — हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला के राजनीतिक विज्ञान विभाग और तिब्बत नीति निर्माण संस्थान धर्मशाला के संयुक्त तत्त्वावधान में सोमवार को विश्वविद्यालय में शिमला समझौता-1914 के 100 वर्ष पूरे होने पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। विवि के कुलपति एडीएन बाजपेयी ने संगोष्ठी में बतौर अतिथि शिरकत की। उन्होंने कहा कि शिमला समझौता-1914 का महत्त्व आज भी कम नहीं हुआ है। प्रदेश विश्वविद्यालय इस संदर्भ में 100 वर्ष पूरा होने पर कार्यक्रम आयोजित करने वाला पहला शैक्षणिक संस्थान है। उन्होंने कहा कि भले ही चीन ने 1914 के शिमला समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए, परंतु वह इस समझौते की अनदेखी नहीं कर सकता। वर्ष 2008 में तिब्बत पर ब्रिटेन द्वारा चीन के साथ आर्थिक संबंधों के चलते अलग नीति बनाने पर भी प्रश्न चिन्ह् लग गया था। इस अवसर पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के प्रो. स्वर्ण सिंह ने अपना व्याख्यान दिया। प्रथम सत्र में तिब्बत की निर्वासित सरकार के सचिव ताशी फुन्चोक ने भी शिमला समझौते के 100 वर्ष पूर्ण होने पर तिब्बत की वर्तमान स्थिति पर विचार व्यक्त किए। दूसरे सत्र में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र हरियाणा के प्रो. आरएस यादव ने अपना व्याख्यान दिया। इसी सत्र में तिब्बत की निर्वासित सरकार के तिब्बत नीति निमार्ण संस्थान में वरिष्ठ शोधकर्ता थंडूप गैल्पो ने तिब्बत की वर्तमान स्थिति पर विचार व्यक्त किए। तीसरे सत्र में लोबसांग तैम्पा और तैन्जिंग नौरगे ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शिमला समझौता 1914 इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इस समझौते के अनुसार हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिलों के साथ लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा से व्यापारिक गतिविधियों के साथ-साथ आवागमन भी होता था।
from Divya Himachal
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